शिव महा पुराण में लिखी ही नहीं गई उस पर भ्रम ना फैलायें– पं. रमाकांत शर्मा

(मनोज जायसवाल)
– आज तीसरे दिन की कथा में शिव पार्वती विवाह प्रसंग।

कांकेर(सशक्त पथ संवाद) श्रीशिव महापुराण कथा वाचन में जिले में तेजी से लोकप्रिय हो रहे लखनपुरी से लगे उडकुडा स्थायी निवासी पं. रमाकांत शर्मा द्वारा परदेशी मंदिर परिसर लखनपुरी में श्रीशिव महापुराण कथा ज्ञान रस प्रवाहित की जा रही है,जिसका भक्त लाभ उठा रहे हैं। पंडाल में भारी भीड उमड रही है।

दूसरे दिन की कथा में रूद्राक्ष धारण किये जाने के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारियां दी। बताया कि रूद्राक्ष भगवान शिव का अश्रु है। कैसे और कब रूद्राक्ष धारण करना चाहिए। किन्हें रूद्राक्ष धारण करना चाहिए पर बताया। शयन करते समय, अंत्येष्टि में जाने पर रूद्राक्ष निकाल देना चाहिए। रूद्राक्ष साधारण वस्तु नहीं है, इसे पूरी तरह नियमबद्व रूप से पहली बार पहनें तो पंचामृत से स्नान कराना चाहिए,गंगाजल से स्नान करा कर सफेद साफ वस्त्र से पोंछे। सफेद तिलक,धूप दिखा कर आरती करें। तत्पश्चात रूद्राक्ष में धागे या चांदी की चैन डालें।

आज कई लोग बाजार से लाकर सामान्य माला जैसे पहन लेते हैं,इससे लाभ नहीं मिल सकता। रूद्राक्ष को लाल या पीले धागे में पुर्णिमा अमावस्या या सोमवार को धारण करना है। महाशिवरात्रि पर रूद्राक्ष धारण करना अति उत्तम है। संख्या देखें तो एक,सत्ताइस या एक सौ आठ धारण करना चाहिए। धारण करने के बाद मांस,मदिरा का सेवन नहीं करना है। रूद्राक्ष धारण करते समय ॐ नमः शिवाय या रूद्राक्ष मुख के अनुसार मंत्रों का उच्चारण तथा अभिषेक  एवं अभिमंत्रित  कर ही करना चाहिए।

आदि अनंत काल से हम शिवलिंग पर जल चढाते आ रहे हैं, हमारी आस्था का उत्तम परिणाम हमारे जीवन में मिलता है। लेकिन तमाम चमत्कार की बातों से हमें बचना चाहिए। बेल पत्र,रूद्राक्ष ऐसे चढाने से ऐसे चमत्कार होगा। छात्रों को बेल पत्र चढाने से प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होंगे। इन सबसे बचना चाहिए और अथक मेहनत करना चाहिए। मेहनत का परिणाम जब प्राप्त हो तो भगवान शिव से इस निवेदन कि मेरी मेहनत का परिणाम मुझे मिला मुझे कर्म के लिए और सहयोग करें की भावना के साथ पूजन किया जाना चाहिए।

देश के अन्य कथा वाचकों से मेरा निवेदन है कि इस प्रकार अनावश्यक चमत्कार की बातें जो श्री शिव महापुराण में लिखी ही नहीं गई है,पर भ्रम ना फैलायें। मेरा विनम्र निवेदन है कि सबको कर्म करने की शिक्षा ही प्रसारित करें।

महाराज का स्वयं का संगीत
जैसे आज कई जगह पंडालों में बालीवुड के संगीत पर धार्मिक गीतों को सुरबद्व कर प्रस्तुत किया जाता है,कई बार बालीवुड के कुछ गाने फुहड भी होते हैं,जिस पर पिराया जाता है,जो कई लोगों को अच्छा नहीं लगता। वैसे भी बालीवुड पर एक ओर फुहडता का प्रहार तो दूसरी ओर उन गीतों तो धार्मिक आयोजनों में पिराना उचित नहीं है।

पं. रमाकांत शर्मा के श्रीशिव महापुराण में जो संगीत की प्रस्तुति बीच-बीच में होती है वो भी उन्हीं के लिखे गीतों पर हो रही है। वैसे भी पं. रमाकांत शर्मा एक अच्छे साहित्यकार हैं, वे गद्व एवं पद्य दोनों लिखते हैं, उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है।

 

 

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