(मनोज जायसवाल)
— चारामा विकासखंड का वह क्षेत्र जहां हर एक किमी पर गांव बसे हैं। अतीत में नाव घाट जाने वाली सभी खेतों के मेंड रास्ते भी अब यादों में सिमट गए।
कांकेर (सशक्त पथ संवाद)। जिले के चारामा विकासखंड का महानदी क्षेत्र जहां विकास की गाथा कहती विकास की बानगी है‚तो उपजाऊ कृषि भुमि में मेहनतकशों की मेहनत का प्रतिफल कि आज जनजीवन में परिवर्तन स्पष्ट परिलक्षित होता है। इसी क्षेत्र का ्ग्राम अरौद जो जिले में ऐतिहासिक अरौद दशहरा के नाम जानी जा रही है‚ तो इसके साथ जेपरा‚गीतपहर‚हल्बा जैसे बडे गांवों के माटी पुत्र कई उच्च शासकीय सेवा में सेवारत हैं। आज कई गावों में नियमित रूप से धार्मिक‚सामाजिक कार्य चलते रहते हैं। किसी ज्वलंत समस्या पर आंदोलन हो आगाज कांकेर जिले में अमूमन यहां से उठते रहे हैंं।
बताते चलें यह भी यादों का अतीत रहा। चारामा से सटे भिरौद घाट जहां महानदी भागों में बंट कर मिलती है,दो बार नाव चढनी पडती। नदी पार करने का एकमात्र साधन नाव और नदी तक आवाजाही के कोई साधन नहीं पैदल एकमात्र अपना कर्म! सायकल कभी ले जाते उसे भी नाव में डाल कर पार कराते,जिसका अतिरिक्त चार्ज लगता।

नाव में जाने के लिए एक व्यक्ति का शुल्क पांच रूपये चार्ज था,इतना ही सायकल का लिया जाता। नाव बनाने पर पूजा के साथ ही नदी में नाव संचालन पूर्व भी विशेष पूजा होती थी। तब आज जैसा ना मोबाईल ना ही सोशल मीडिया। जो कैमरे रखता लोगों के लिए बडी बात होती थी। यह चित्र भी भिरौद घाट का ही है। निगेटिव धुलाई रील के जमाने में वर्ष 1992 में खींची गयी थी। यह फोटो फोर बाई सिक्स साईज में निकाल कर रखा गया ब्लेक एण्ड व्हाईट फोटो हम सबके यादों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।
इस फोटो में भिरौद निवासी बाला राम के साथ गांव के रामदेव सिन्हा दिखायी दे रहे हैं। बालाराम जो कन्या शाला चारामा के चपरासी पद पर थे, वे आज गांव में कृषि करते हैं, तो रामदेव सिन्हा शासकीय उचित मुल्य दुकान का संचालन करते हैं,वे विक्रेता संघ के प्रदेश अध्यक्ष है। महानदी के ऊपरी घाटों की बात करें तो हाराडुला घाट के बाद टांहकापार एवं सर्वाधिक व्यस्त रहने वाले भैंसाकट्टा घाट हुआ करता था। इससे पूर्व बांडाटोला घाट हुआ करता था जहां सढ्ढु डोकरा के नाम हमारे दादा जी संचालन किया करते। भैंसाकट्टा मे स्व. झाडू राम(दाढी), रोहित,बरतिया राम,देवचरण,जैन जो नाव चलाते हुए इसका संचालन किया करते थे। इसके ऊपरी क्षेत्र शाहवाडा घाट में स्व. मदन एवं स्व. बृजलाल कोडोपी जो नाव चलाते हुए,नदी के किनारे अपने खेत में कृषि करते थे, जो अब इस दुनियां में नहीं है।अतीत में नाव घाट जाने वाली सभी खेतों के मेंड रास्ते भी अब यादों में सिमट गए। महानदी के अरौद घाट में पुल निर्माण हेतु कांग्रेस शासन काल में जब अविभाजित मध्यप्रदेश काल में तात्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा का ग्राम जेपरा आगमन हुआ तो वहां से महानदी पर पुल की घोषणा हुई। कुछ वर्षों में अरौद घाट में पुल निर्माण हुआ। इसके चालू होते ही तेजी से महानदी तटीय क्षेत्र ने ऐसा विकास किया कि चारामा विकासखंड के जिन क्षेत्रों में पहले से यातायात की सुविधा रही उससे यह क्षेत्र आगे निकल गया। यह क्षेत्र आज पूरे बस्तर संभाव में सबसे ज्यादा जागरूक क्षेत्र की श्रेणी में आता है। कहां वह 1980-90 का वो जमाना और आज का वो दशक जहां महानदी में कई पुल बन गये तो और भी कई जगह पुल की मांग की जा रही है। जिन्होंने अल्प वर्ष इस क्षेत्र में बाहर रहे वो यह क्षेत्र आयें तो उन्हें यह क्षेत्र विकास में अग्रणी नजर आता है।
महानदी क्षेत्र में हर 01 किमी में गांव है,जहां तांसी ,जुनवानी, भिलाई,पंडरीपानी,भिरौद, करिहा,हाराडुला,किलेपार,टांहकापार,अरौद, भैंसाकट्टा,बांडाटोला,शाहवाडा, कुरना,ढेकुना नारा महानदी घाट में बने पुल से पार कर आप सीधा जिला मुख्यालय कांकेर जा सकते हैं। इस क्षेत्र में सुगम यातायात की सुविधा है,आज हर गावों में निजी यात्री बसों का संचालन किया जा रहा है। गांव गांव सडकों के जाल के साथ बिजली पर्याप्त सुविधा है। इस क्षेत्र से आगे नरहरपुर तहसील को सडकें जोडती है।







